Thursday, November 27, 2008

धाराजी एक स्मृति - 3

ओम्कारेश्वर से धाराजी या धायड़ी ज्यादा दूर नहीं है। परन्तु पहुंचना उतना आसान नहीं है। वेगड़ जी का लिखा इसका शब्द परिचय पढ़ा …

छोटे-बड़े, चौड़े- संकरे, खड़े और फिसलपट्टी जैसे तिरछे – सभी तरह के प्रपात हैं यहां। कुछ प्रपात बहुत अधिक आक्रामक हैं, तो कुछ चट्टानों में घुसपैठ करने में माहिर हैं। दो-एक छैल- छबीले प्रपात भी हैं। सबसे बड़े प्रपात का पानी मध्य में हलके हरे रंग का है। हरित प्रपात! धावड़ीकुंड यानी प्रपातों का डिपार्टमेंटल स्टोर! अपनी पसंद का प्रपात चुनिए, उसके प्रचंड प्रवाह को देखिए, उसकी गर्जना को सुनिए, उसकी फुहार में भीगिए और उसे अपना बना लीजिए!


नीचे कुंड में जो घमासान मचा है, वह तो और भी लोमहर्षक है। कुंड एक खौलते कड़ाह जैसा लग रहा है। समझ में नहीं आता कि यहाँ सर्जन हो रहा है या विध्वंस ! उफनते पानी का उछलना, उभरना, झपटना, टकराना, धक्कामुक्की करना और फिर फेनिल लहरिए बनाते हुए तेजी से आगे बढ़ जाना! मानो हजारों सतलड़े हार बहते चले जा रहे हों!

चट्टानों से दो-दो हाथ करने में नर्मदा को मजा आता है। और चट्टान और नदी की लड़ाई में विजय सदा नदी की ही होती है।”

वास्तव में उनके इस वर्णन ने मुझे बाध्य किया कि मैं इस कार्य के लिए समय और मार्ग तलाश करुं। स्थानीय लोगो से बात करने से पता चला कि ओम्कारेश्वर से नाव से जाना ठीक रहेगा।

क्रमश:

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