Thursday, November 27, 2008

धाराजी एक स्मृति - 5

पुराणों में भी धाराजी का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि अपने त्रिपुरी के दग्ध होने पर बाणासुर ने भयभीत होकर धाराजी क्षेत्र में भगवान शिव की स्तुति करते हुए घोर तपस्या की थी उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे वरदान दिया था कि मेरी भक्ति के प्रसाद से तुम मेरे समीप ही सपरिवार निवास करोगे और तुम्हारा पुनर्जन्म भी नहीं होगा। तुमने जिन करोड़ों पार्थिव मिट्टी के शिवलिंगों को बनाकर मेरा पूजन किया है। उन्हें नर्मदा नदी में धाराजी क्षेत्र में स्थित कुण्डों में डाल दो। कालांतर में इन कुण्डों से निकलकर यह शिवलिंग पूरे विश्व में स्थापित होंगे और बाणलिंग कहलायेंगे। पानी के भंवरों से हुई कटाई के फलस्वरूप विभिन्न रंगों के पाषाण पिण्ड इन कुंडों में पाये जाते थे। कहते हैं इन लिंगों की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है। इन्हें नर्मदेश्वर लिंग भी कहा जाता है।


यहां मेरी भेंट श्री मानसिंह जी से हुईं जिनका परिवार कई सालों से इन्ही शिवलिंगों को पानी के तीव्र प्रवाह मे से निकालने के लिये पारन्गत हैं। श्री मानसिंहजी जान जोखिम में डालकर इन कुण्डों में प्रवेश करते हैं। उनकी डुबकी का समय कई मिनटों का होता है। कभी तो भय होता है कि वो कहीं जल मे समा तो नहीं गये परन्तु फिर वो कुछ शिवलिंगों को लेकर उपर आ जाते थे। इनके निकाले गये शिवलिंग देश के बहुत सारे मंदिरों में स्थापित हैं।

धाराजी प्रपात के जलमग्न होने से पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं श्री मानसिंह जी की आंखों में भविष्य के सवाल है वो सोचते हैं कि पूरा जीवन इस कार्य में लग गया अब क्या करेंगे ?

क्रमश:

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