Thursday, November 27, 2008

धाराजी एक स्मृति - 4

मैंने अपनी पहली यात्रा ओम्कारेश्वर से नाव द्वारा संपन्न की थी। वह यात्रा यादगार तथा अत्यंत रोमांचकारी थी। नर्मदा का सौंदर्य इस क्षेत्र में शायद जबलपुर के बंदरकूदनी जैसा प्रतीत होता है, दोंनो ओर चट्टानी तटों से घिरा हुआ। रास्तों में छोटे मोटे गांव और प्रवासी पक्षियों के डेरे नजर आते हैं।

बाद की यात्रायें क्रमशः पुनासा (ज़िला - खंडवा) तथा देवास वाले मार्ग से की गई। यह स्थान देवास जिले में है । जीप से यह देवास से लगभग -? किमी है। पुनासा से भी (14 किमी) तट के बायें ओर पहुंचा जा सकता था परन्तु बायें तट से इसकी सुन्दरता का आनंद अधूरा आता है।

नाव से धाराजी पहुंचने पर प्रपात की सुन्दरता देखकर चार घन्टे तक नाव में लगे हिचकोलों की थकान तुरन्त दूर हो गयी। जैसा कि पुस्तक में वर्णन किया गया है, धाराजी में नर्मदा के जल प्रवाह ने कटाव में आकर्षक पैटर्न प्रस्तुत किये थे।

चट्टानों में ओखली के आकार के 200 मी चौड़ाई तक के कुंड या कटोरेनुमा आकृतियाँ बनी हुई थी। जिससे बहता पानी एक अतभुद दृश्य का निर्माण करता था।



कहते हैं कि नर्मदा जी पहले इस रास्ते से ना होकर कुछ किमी दूर रास्ते से बहती थी। करोड़ों साल पहले धारा के इस मार्ग में चट्टानों के कटाव से इस अदभुत भौगोलिक रचना का जन्म हुआ।

क्रमश:

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